CBSE Class 8 Hindi Unseen Passages अपठित गद्यांश

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CBSE Class 8 Hindi Unseen Passages अपठित गद्यांश

‘अपठित’ गद्यांश या पद्यांश का अर्थ है- जो पहले पढ़ा गया न हो। अपठित गद्यांश या पद्यांश पाठ्यपुस्तकों से नहीं लिए जाते। ये ऐसे गद्यांश या पद्यांश होते हैं जिन्हें छात्र पहले कभी नहीं पढ़ा होता। इस प्रकार के गद्यांश-पद्यांश देकर छात्रों से उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर पूछे जाते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अनुच्छेद को दो-तीन बार पढ़ना चाहिए। इसके बाद अनुच्छेद के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने शब्दों में लिखने चाहिए। भाषा स्पष्ट और शुद्ध होनी चाहिए।

उदाहरण ( उत्तर सहित)
1. संसार में शांति, व्यवस्था और सद्भावना के प्रसार के लिए बुद्ध, ईसा मसीह, मुहम्मद चैतन्य, नानक आदि महापुरुषों ने धर्म के माध्यम से मनुष्य को परम कल्याण के पथ का निर्देश किया, किंतु बाद में यही धर्म मनुष्य के हाथ में एक अस्त्र बन गया। धर्म के नाम पर पृथ्वी पर जितना रक्तपात हुआ उतना और किसी कारण से नहीं। पर धीरे-धीरे मनुष्य अपनी शुभ बुधि से धर्म के कारण होने वाले अनर्थ को समझने लग गया है। भौगोलिक सीमा और धार्मिक विश्वासजनित भेदभाव अब धरती से मिटते जा रहे हैं। विज्ञान की प्रगति तथा संचार के साधनों में वृद्धि के कारण देशों की दूरियाँ कम हो गई हैं। इसके कारण मानव-मानव में घृणा, ईष्र्या वैमनस्य कटुता में कमी नहीं आई। मानवीय मूल्यों के महत्त्व के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने का एकमात्र साधन है शिक्षा का व्यापक प्रसार।

प्रश्न

(क) मनुष्य अधर्म के कारण होने वाले अनर्थ को कैसे समझने लगा है
(i) संतों के अनुभव से
(ii) वर्ण भेद से
(iii) घृणा, ईर्ष्या, वैमनस्य, कटुता से
(iv) अपनी शुभ बुधि से

(ख) विज्ञान की प्रगति और संचार के साधनों की वृद्धि का परिणाम क्या हुआ है|
(i) देशों में भिन्नता बढ़ी है।
(ii) देशों में वैमनस्यता बढ़ी है।
(iii) देशों की दूरियाँ कम हुई है।
(iv) देशों में विदेशी व्यापार बढ़ा है।

(ग) देश में आज भी कौन-सी समस्या है
(i) नफ़रत की
(ii) वर्ण-भेद की
(iii) सांप्रदायिकता की
(iv) अमीरी-गरीबी की

(घ) किस कारण से देश में मानव के बीच, घृणा, ईष्र्या, वैमनस्यता एवं कटुता में कमी नहीं आई है?
(i) नफ़रत से
(ii) सांप्रदायिकता से
(iii) अमीरी गरीबी के कारण
(iv) वर्ण-भेद के कारण

(ङ) मानवीय मूल्यों के महत्त्व के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने का एकमात्र साधन है
(i) शिक्षा का व्यापक प्रसार
(ii) धर्म का व्यापक प्रसार
(ii) प्रेम और सद्भावना का व्यापक प्रसार
(iv) उपर्युक्त सभी

उत्तर-
(क) (iv)
(ख) (iii)
(ग) (ii)
(घ) (iv)
(ङ) (i)

2. संघर्ष के मार्ग में अकेला ही चलना पड़ता है। कोई बाहरी शक्ति आपकी सहायता नहीं करती है। परिश्रम, दृढ़ इच्छा शक्ति व लगन आदि मानवीय गुण व्यक्ति को संघर्ष करने और जीवन में सफलता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। दो महत्त्वपूर्ण तथ्य स्मरणीय है – प्रत्येक समस्या अपने साथ संघर्ष लेकर आती है। प्रत्येक संघर्ष के गर्भ में विजय निहित रहती है। एक अध्यापक छोड़ने वाले अपने छात्रों को यह संदेश दिया था – तुम्हें जीवन में सफल होने के लिए समस्याओं से संघर्ष करने को अभ्यास करना होगा। हम कोई भी कार्य करें, सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने का संकल्प लेकर चलें। सफलता हमें कभी निराश नहीं करेगी। समस्त ग्रंथों और महापुरुषों के अनुभवों को निष्कर्ष यह है कि संघर्ष से डरना अथवा उससे विमुख होना अहितकर है, मानव धर्म के प्रतिकूल है और अपने विकास को अनावश्यक रूप से बाधित करना है। आप जागिए, उठिए दृढ़-संकल्प और उत्साह एवं साहस के साथ संघर्ष रूपी विजय रथ पर चढ़िए और अपने जीवन के विकास की बाधाओं रूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कीजिए।

प्रश्न

(क) मनुष्य को संघर्ष करने और जीवन में सफलता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं
(i) निर्भीकता, साहस, परिश्रम
(ii) परिश्रम, लगन, आत्मविश्वास
(iii) साहस, दृढ़ इच्छाशक्ति, परिश्रम
(iv) परिश्रम, दृढ़ इच्छा शक्ति व लगन

(ख) प्रत्येक समस्या अपने साथ लेकर आती है–
(i) संघर्ष
(ii) कठिनाइयाँ
(iii) चुनौतियाँ
(iv) सुखद परिणाम

(ग) समस्त ग्रंथों और अनुभवों का निष्कर्ष है
(i) संघर्ष से डरना या विमुख होना अहितकर है।
(ii) मानव-धर्म के प्रतिकूल है।
(iii) अपने विकास को बाधित करना है।
(iv) उपर्युक्त सभी

(घ) ‘मानवीय’ शब्द में मूल शब्द और प्रत्यय है
(i) मानवी + य
(ii) मानव + ईय
(iii) मानव + नीय
(iv) मानव + इय

(ङ) संघर्ष रूपी विजय रथ पर चढ़ने के लिए आवश्यक है
(i) दृढ़ संकल्प, निडरता और धैर्य
(ii) दृढ़ संकल्प, उत्साह एवं साहस
(iii) दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास और साहस
(iv) दृढ़ संकल्प, उत्तम चरित्र एवं साहस

उत्तर-
(क) (iv)
(ख) (i)
(ग) (iv)
(घ) (ii)
(ङ) (ii)

3. कार्य का महत्त्व और उसकी सुंदरता उसके समय पर संपादित किए जाने पर ही है। अत्यंत सुघड़ता से किया हुआ कार्य भी यदि आवश्यकता के पूर्व न पूरा हो सके तो उसका किया जाना निष्फले ही होगा। चिड़ियों द्वारा खेत चुग लिए जाने पर यदि रखवाला उसकी सुरक्षा की व्यवस्था करे तो सर्वत्र उपहास का पात्र ही बनेगा।

उसके देर से किए गए उद्यम का कोई मूल्य नहीं होगा। श्रम का गौरव तभी है जब उसका लाभ किसी को मिल सके। इसी कारण यदि बादलों द्वारा बरसाया गया जल कृषक की फ़सल को फलने-फूलने में मदद नहीं कर सकता तो उसका बरसना व्यर्थ ही है। अवसर का सदुपयोग न करने वाले व्यक्ति को इसी कारण पश्चाताप करना पड़ता है।

प्रश्न

(क) जीवन में समय का महत्त्व क्यों है?
(i) समय काम के लिए प्रेरणा देता है।
(ii) समय की परवाह लोग नहीं करते।
(iii) समय पर किया गया काम सफल होता है।
(iv) समय बड़ा ही बलवान है।

(ख) खेत का रखवाला उपहास का पात्र क्यों बनता है?
(i) खेत में पौधे नहीं उगते।
(ii) समय पर खेत की रखवाली नहीं करता।
(iii) चिड़ियों का इंतजार करता रहता है।
(iv) खेत पर मौजूद नहीं रहता।।

(ग) चिड़ियों द्वारा खेत चुग लिए जाने पर यदि रखवाला उसकी सुरक्षा की व्यवस्था करे तो सर्वत्र उपहास का पात्र ही बनेगा। इस पदबंध का प्रकार होगा
(i) संज्ञा
(ii) सर्वनाम
(iii) क्रिया
(iv) क्रियाविशेषण

(घ) बादल का बरसना व्यर्थ है, यदि
(i) गरमी शांत न हो।
(ii) फ़सल को लाभ न पहुँचे
(iii) किसान प्रसन्न न हो
(iv) नदी-तालाब न भर जाएँ

(ङ) गद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
(i) बादल का बरसना
(ii) चिड़ियों द्वारा खेत का चुगना
(iii) किसान का पछतावा करना
(iv) समय का सदुपयोग

उत्तर-
(क) (iii)
(ख) (ii)
(ग) (i)
(घ) (ii)
(ङ) (iv)

4. मानव जाति को अन्य जीवधारियों से अलग करके महत्त्व प्रदान करने वाला जो एकमात्र गुरु है, वह है उसकी विचार-शक्ति। मनुष्य के पास बुधि है, विवेक है, तर्कशक्ति है अर्थात उसके पास विचारों की अमूल्य पूँजी है। अपने सविचारों की नींव पर ही आज मानव ने अपनी श्रेष्ठता की स्थापना की है और मानव-सभ्यता का विशाल महल खड़ा किया है। यही कारण है कि विचारशील मनुष्य के पास जब सविचारों का अभाव रहता है तो उसका वह शून्य मानस कुविचारों से ग्रस्त होकर एक प्रकार से शैतान के वशीभूत हो जाता है। मानवी बुधि जब सद्भावों से प्रेरित होकर कल्याणकारी योजनाओं में प्रवृत्त रहती है तो उसकी सदाशयता का कोई अंत नहीं होता, किंतु जब वहाँ कुविचार अपना घर बना लेते हैं तो उसकी पाशविक प्रवृत्तियाँ उस पर हावी हो उठती हैं। हिंसा और पापाचार का दानवी साम्राज्य इस बात का द्योतक है कि मानव की विचार-शक्ति, जो उसे पशु बनने से रोकती है, उसका साथ देती है।

प्रश्न

(क) मानव जाति को महत्त्व देने में किसका योगदान है?
(i) शारीरिक शक्ति का
(ii) परिश्रम और उत्साह का
(iii) विवेक और विचारों का
(iv) मानव सभ्यता का

(ख) विचारों की पूँजी में शामिल नहीं है
(i) उत्साह
(ii) विवेक
(iii) तर्क
(iv) बुधि

(ग) मानव में पाशविक प्रवृत्तियाँ क्यों जागृत होती हैं?
(i) हिंसाबुधि के कारण
(ii) असत्य बोलने के कारण
(iii) कुविचारों के कारण
(iv) स्वार्थ के कारण

(घ) “मनुष्य के पास बुधि है, विवेक है, तर्कशक्ति है’ रचना की दृष्टि से उपर्युक्त वाक्य है
(i) सरल
(ii) संयुक्त
(iii) मिश्र
(iv) जटिल

(ङ) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक हो सकता है
(i) मनुष्य का गुरु
(ii) विवेक शक्ति
(iii) दानवी शक्ति
(iv) पाशविक प्रवृत्ति

उत्तर-
(क) (iii)
(ख) (i)
(ग) (iii)
(घ) (i)
(ङ) (ii)

5. बातचीत करते समय हमें शब्दों के चयन पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि सम्मानजनक शब्द व्यक्ति को उदात्त एवं महान बनाते हैं। बातचीत को सुगम एवं प्रभावशाली बनाने के लिए सदैव प्रचलित भाषा का ही प्रयोग करना चाहिए। अत्यंत साहित्यिक एवं क्लिष्ट भाषा के प्रयोग से कहीं ऐसा न हो कि हमारा व्यक्तित्व चोट खा जाए। बातचीत में केवल विचारों का ही आदानप्रदान नहीं होता, बल्कि व्यक्तित्व का भी आदान-प्रदान होता है। अतः शिक्षक वर्ग को शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए। शिक्षक वास्तव में एक अच्छा अभिनेता होता है, जो अपने व्यक्तित्व, शैली, बोलचाल और हावभाव से विद्यार्थियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है और उन पर अपनी छाप छोड़ता है।

प्रश्न

(क) शिक्षक होता है
(i) राजनेता
(ii) साहित्यकार
(iii) अभिनेता
(iv) कवि

(ख) बातचीत में किस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना चाहिए?
(i) अप्रचलित
(ii) प्रचलित
(iii) क्लिष्ट
(iv) रहस्यमयी

(ग) शिक्षक वर्ग को बोलना चाहिए?
(i) सोच-समझकर
(ii) ज्यादा
(iii) बिना सोचे-समझे
(iv) तुरंत

(घ) बातचीत में आदान-प्रदान होता है–
(i) केवल विचारों का
(ii) केवल भाषा का
(ii) केवल व्यक्तित्व का
(iv) विचारों एवं व्यक्तित्व का

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक है
(i) बातचीत की कला
(ii) शब्दों का चयन
(iii) साहित्यिक भाषा
(iv) व्यक्तित्व का प्रभाव

उत्तर-
(क) (iii)
(ख) (iii)
(ग) (i)
(घ) (iv)
(ङ) (ii)

6. मनुष्य को चाहिए कि संतुलित रहकर अति के मार्गों का त्यागकर मध्यम मार्ग को अपनाए। अपने सामर्थ्य की पहचान कर उसकी सीमाओं के अंदर जीवन बिताना एक कठिन कला है। सामान्य पुरुष अपने अहं के वशीभूत होकर अपना मूल्यांकन अधिक कर बैठता है और इसी के फलस्वरूप वह उन कार्यों में हाथ लगा देता है जो उसकी शक्ति में नहीं हैं। इसलिए सामर्थ्य से अधिक व्यय करने वालों के लिए कहा जाता है कि ‘तेते पाँव पसारिए, जेती लांबी सौर’। उन्हीं के लिए कहा गया है कि अपने सामर्थ्य , को विचार कर उसके अनुरूप कार्य करना और व्यर्थ के दिखावे में स्वयं को न भुला देना एक कठिन साधना तो अवश्य है, पर सबके लिए यही मार्ग अनुकरणीय है।

प्रश्न

(क) अति का मार्ग क्या होता है?
(i) असंतुलित माग
(ii) संतुलित मार्ग
(iii) अमर्यादित मार्ग
(iv) मध्यम मार्ग

(ख) कठिन कला क्या है?
(i) सामर्थ्य के बिना सीमारहित जीवन बिताना
(ii) सामर्थ्य को बिना पहचाने जीवन बिताना
(iii) सामर्थ्य की सीमा में जीवन बिताना
(iv) सामर्थ्य न होने पर भी जीवन बिताना

(ग) मनुष्य अहं के वशीभूत होकर
(i) अपने को महत्त्वहीन समझ लेता है।
(ii) किसी को महत्त्व देना छोड़ देता है।
(iii) अपना सर्वस्व खो बैठता है।
(iv) अपना अधिक मूल्यांकन कर बैठता है।

(घ) “तेते पाँव पसारिए, जेती लांबी सौर’ का आशय है
(i) सामर्थ्य के अनुसार कार्य न करना
(ii) सामर्थ्य के अनुसार कार्य करना
(iii) व्यर्थ का दिखावा करना
(iv) आय से अधिक व्यय करना

(ङ) प्रस्तुत गद्यांश का शीर्षक हो सकता है
(i) आय के अनुसार व्यय
(ii) दिखावे में जीवन बिताना
(iii) सामर्थ्य से अधिक व्यय करना
(iv) सामर्थ्य के अनुसार कार्य करना

उत्तर-
(क) (iii)
(ख) (iii)
(ग) (iv)
(घ) (ii)
(ङ) (iv)

अभ्यास प्रश्न

1. सुख विश्वास से उत्पन्न होता है। सुख जड़ता से भी उत्पन्न होता है। पुराने जमाने के लोग सुखी इसलिए थे कि ईश्वर की सत्ता में उन्हें विश्वास था। उस जमाने के नमूने आज भी हैं, मगर वे महानगरों में कम मिलते हैं। उनका जमघट गाँवों, कस्बों या छोटे-छोटे नगरों में है। इनके बहुत अधिक असंतुष्ट न होने का कारण यह है कि जो चीज़ उनके बस में नहीं है, उसे वे अदृश्य की इच्छा पर छोड़कर निश्चित हो जाते हैं। इसी प्रकार सुखी वे लोग भी होते हैं, जो सच्चे अर्थों में जड़तावादी हैं, क्योंकि उनकी आत्मा पर कठखोदी चिड़िया चोंच नहीं मारा करती, किंतु जो न जड़ता को स्वीकार करता है, न ईश्वर के अस्तित्व को तथा जो पूरे मन से न तो जड़ता का त्याग करता है और न ईश्वर के अस्तित्व का, असली वेदना उसी संदेहवादी मनुष्य की वेदना है। पश्चिम का आधुनिक बोध इसी पीड़ा से ग्रस्त है। वह न तो मनुष्य भैंस की तरह खा-पीकर संतुष्ट रह सकता है न अदृश्य का अवलंब लेकर चिंतामुक्त हो सकता है। इस अभागे मनुष्य के हाथ में न तो लोक रह गया है, न परलोक। लोक इसलिए नहीं कि वह भैंस बनकर जीने को तैयार नहीं है और परलोक इसलिए नहीं कि विज्ञान उसका समर्थन नहीं करता। निदान, संदेहवाद के झटके खाता हुआ यह आदमी दिन-रात व्याकुल रहता है और रह-रहकर आत्महत्या की कल्पना करके अपनी व्याकुलता का रेचन करता रहता है।

प्रश्न

(क) सुख किनसे उत्पन्न होता है?
(i) विश्वास
(ii) जड़ता
(iii) (क) व (ख)
(iv) कोई नहीं

(ख) गाँवों में लोग असंतुष्ट नहीं हैं क्योंकि
(i) वे अदृश्य पर अपनी चिंता छोड़ देते हैं।
(ii) उनके पास सभी सुविधाएँ हैं।
(iii) वे शक्तिशाली हैं।
(iv) कोई नहीं।

(ग) सुखी वे होते हैं जो
(i) जड़ता को स्वीकार नहीं करते
(ii) ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते
(iii) (क) व (ख)
(iv) कोई नहीं

(घ) पश्चिम का आधुनिक बोध किससे पीड़ित है
(i) संदेहवादी दृष्टि
(ii) आस्तिकवाद
(iii) अस्तित्ववाद:
(iv) कोई नहीं

(ङ) ‘विश्वास’ का विलोम है
(i) अविश्वास
(ii) धोखा
(iii) भेदभाव
(iv) कोई नहीं

2. वीरता की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से होती है। लड़ना-मरना, खून बहाना, तोप-तलवार के सामने न झुकना ही नहीं कर्ण की भाँति याचक को खाली हाथ न लौटाना या बुद्ध की भाँति गूढ़ तत्वों की खोज में सांसारिक सुख त्याग देना भी वीरता ही। है। वीरता तो एक अंत:प्रेरणा है। वीरता देश-काल के अनुसार संसार में जब भी प्रकट हुई, तभी अपना एक नया रूप लेकर आई और लोगों को चकित कर गई। वीर कारखानों में नहीं ढलते, न खेतों में उगाए जाते हैं, वे तो देवदार के वृक्ष के समान जीवनरूपी वन में स्वयं उगते हैं, बिना किसी के पानी दिए, बिना किसी के दूध पिलाए बढ़ते हैं। वीर का दिल सबका दिल और उसके विचार सबके विचार हो जाते हैं। उसके संकल्प सबके संकल्प हो जाते हैं। औरतों और समाज का हृदय वीर के हृदय में धड़कता है।

प्रश्न

(क) वीरता के प्रकार हैं
(i) लड़ाई
(ii) याचक को खाली हाथ न जाने देना
(iii) ज्ञान की खोज में संसार-त्याग
(iv) उपर्युक्त सभी

(ख) उपयुक्त शीर्षक दीजिए
(i) वीरता
(ii) वीरों का उद्भव
(iii) वीरता का महल
(iv) कोई नहीं

(ग) वीर कहाँ उत्पन्न होते हैं?
(i) वे देवदार के वृक्ष के समान स्वयं उगते हैं तथा बड़े होते हैं।
(ii) कारखानों में
(iii) खेतों में
(iv) कोई नहीं

(घ) वीर पुरुष की क्या पहचान है?
(i) वह सबका चहेता होता है।
(ii) उसके संकल्प समाज के संकल्प होते हैं।
(iii) (क) व (ख)
(iv) कोई नहीं।

(ङ) ‘सुख’ का विलोम है
(i) दुख
(ii) सुखी
(iii) कमज़ोर
(iv) कोई नहीं

3. उन्नीसवीं शताब्दी में यह राष्ट्रीय जागरण संपूर्ण भारत में किसी-न-किसी रूप में अभिव्यक्त हो रहा था, जिसमें भारतीयता के साथ आधुनिकता का संगम था। स्वामी विवेकानंद ने तो अमेरिका, इंग्लैंड आदि देशों से भारत लौटकर पूर्व और पश्चिम के श्रेष्ठ तत्वों के सम्मिलन से भारत को आधुनिक बनाने का स्वप्न देखा था। उन्होंने माना कि भारत और पश्चिम की मूल गति एवं उद्देश्य भिन्न हैं, परंतु भारत को जागना होगा, कुसंस्कारों एवं जाति-विद्वेष को त्यागना होगा, शिक्षित होकर देश की अशिक्षित, गरीब जनता को ही ‘दरिद्रनारायण’ मानकर उनकी सेवा करनी होगी, उनका उत्थान करना होगा। विवेकानंद का मत था कि भारत में जो जितना दरिद्र है, वह उतना ही साधु है। यहाँ गरीबी अपराध एवं पाप नहीं है तथा दरिद्रों की अपेक्षा धनियों को अधिक प्रकाश की जरूरत है। वे चाहते थे कि हम नीच, अज्ञानी, दरिद्र-सभी को भाई मानें और गर्व से कहें-हम सब भाई भारतवासी हैं। मनुष्य को मानव बनाना, आदमी को इंसान बनाना आवश्यक है। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो हमें संस्कारी मानव, हमदर्द इंसान बना सके। विचारों में विवेकानंद गांधी से अधिक दूर नहीं थे और ऐसे ही विचारकों का चिंतन उन्नीसवीं सदी में भारत को उद्वेलित कर रहा था।

प्रश्न

(क) किस सदी में संपूर्ण भारत में राष्ट्रीय जागरण अभिव्यक्त हो रहा था?
(i) उन्नीसवीं सदी में
(ii) अठारहवीं सदी में
(iii) बीसवीं सदी में
(iv) इक्कीसवीं सदी में

(ख) विवेकानंद ने क्या सपना देखा था?
(i) विदेशी तर्ज पर भारत का विकास
(ii) पूर्व व पश्चिम के तत्वों का मिलन
(iii) भारत को आधुनिक बनाना
(iv) (ख) व (ग)

(ग) विवेकानंद के अनुसार भारतीयों को कैसी शिक्षा की जरूरत है?
(i) आदमी को आदमी बनाने वाली
(ii) अंग्रेजी पढ़ाने वाली
(iii) भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने वाली
(iv) कोई नहीं

(घ) “पश्चिम’ का विशेषण बताइए
(i) पश्चिमी
(ii) पाश्चात्य
(iii) पश्च
(iv) कोई नहीं

(ङ) विवेकानंद के अनुसार किसे अधिक प्रकाश की ज़रूरत है?
(i) दरिद्र
(ii) धनिकों
(iii) सामंतों
(iv) कोई नहीं

4. सत्य के अनेक रूप होते हैं, इस सिद्धांत को मैं बहुत पसंद करता हूँ। इसी सिद्धांत ने मुझे एक मुसलमान को उसके अपने | दृष्टिकोण से और ईसाई को उसके स्वयं के दृष्टिकोण से समझाना सिखाया है। जिन अंधों ने हाथी का अलग-अलग तरह वर्णन किया वे सब अपनी दृष्टि से ठीक थे। एक-दूसरे की दृष्टि से सब गलत थे और जो आदमी हाथी को जानता था उसकी दृष्टि से सही भी थे और गलत भी थे।

जब तक अलग-अलग धर्म मौजूद हैं तब तक प्रत्येक धर्म को किसी विशेष बाह्य चिह्न की आवश्यकता हो सकती है लेकिन जब बाह्य चिह्न केवल आडंबर बन जाते हैं अथवा अपने धर्म को दूसरे धर्मों से अलग बताने के काम आते हैं तब वे त्याज्य हो जाते हैं।

धर्मों के भ्रातृ-मंडल का उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह हिंदू को अधिक अच्छा हिंदू, एक मुसलमान को अधिक अच्छा मुसलमान और एक ईसाई को अधिक अच्छा ईसाई बनाने में मदद करे। दूसरों के लिए हमारी प्रार्थना वह नहीं होनी चाहिए-ईश्वर, तू उन्हें वही प्रकाश दे जो तूने मुझे दिया है, बल्कि यह होनी चाहिए-तू उन्हें वह सारा प्रकाश दे जिसकी उन्हें अपने सर्वोच्च विकास के लिए आवश्यकता है।

प्रश्न

(क) लेखक किस सिद्धांत को पसंद करता है?
(i) सत्य के अनेक रूप हैं।
(ii) सत्य का एक रूप होता है।
(iii) सत्य नश्वर है।
(iv) कोई नहीं।

(ख) लेखक किस कथा का जिक्र करता है?
(i) अंधों द्वारा बकरी का वर्णन
(ii) अंधों द्वारा हाथी का वर्णन
(iii) अंधों द्वारा आदमी का वर्णन
(iv) कोई नहीं

(ग) धर्म की पृथकता दर्शाने के लिए किस चीज़ की आवश्यकता होती है?
(i) बाह्य चिह्न
(ii) सिद्धांत
(iii) संघ
(iv) समर्थकों की

(घ) धर्म के भ्रातृ-मंडल का क्या उद्देश्य होना चाहिए?
(i) हर व्यक्ति अच्छा बने
(ii) धर्म का कट्टर समर्थक बने
(iii) (क) व (ख)
(iv) कोई नहीं

(ङ) ‘सत्य’ का तद्भव रूप बताइए।
(i) सच
(ii) सच्ची
(iii) सत्
(iv) कोई नहीं

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